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गजल

आवरण में है छुपे विष के चेहरे कोई कैसे जान पाए भेद गहरे। एक छटपटाहट गहराई में गर्त है तभी किनारो से लड़ रही है लहरे।  इस शहर को अब सवांरा जाएगा ये मुनादी कर रहे है लोग बहरे।  एक अजब ही दौड़ जारी है यहाँ कोई आखिर सुकूँ से कैसे ठहरे। इक अदद सी कामयाबी के लिए कितनो को पहनाऊँ यहाँ सेहरे।  क़ायनात पे गर बस उनका चलता वो लगा देते हमारी सासों पे पहरे। 
अचानक नही टूटा हूं कब से दरक रहा था। कोई समझ नही पाया नजर का फरक रहा था। कही उसे देख न लू चुपके से सरक रहा था।

गजल

क्या नही है दातार के दर पर बिन मांगे झोलियाँ भर देता है। कुछ कहने की जरूरत नही वो पहले ही काम कर देता है। जैसी होती है भावना जिसकी वो वैसे ही उसको वर देता है। वो देता है पेट भरने को अन्न ऒर वो रहने को घर देता है। वो ही है जो सुनता है सबकी वो ही दुआओं में असर देता है। खुशनुमा शामें भी उसी ने दी  और वो सुहानी सहर देता है। उसी ने थामा है हाथ सबका वो ही सुकून के पहर देता है।

एकता की डोर।

भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान उसका परिवार है। यहाँ रिश्ते सिर्फ खून के नहीं, बल्कि भावनाओं और संस्कारों से भी जुड़े होते हैं। संयुक्त परिवार की परंपरा भारतीय समाज की रीढ़ रही है, जहाँ तीन-चार पीढ़ियाँ एक साथ रहती हैं, एक-दूसरे का सहारा बनती हैं और जीवन मूल्यों को आगे बढ़ाती हैं। ऐसे ही संस्कार शर्मा परिवार में भी कूट कूट कर भरे हुए थे। जहाँ सभी लोग एक दूसरे का सम्मान करते हुए सामंजस्य के साथ सौहार्दपूर्ण वातावरण में साथ साथ रहते थे।  शर्मा परिवार शहर का एक सम्मानित,जाना पहचाना परिवार था,जिसके मुखिया देवनारायण जी शर्मा रिटायर्ड बैक मैनेजर थे। दोनो बेटे अजय और विनोद सरकारी कर्मचारी,अजय बैंक में तो विनोद अध्यापक के पद पर कार्यरत थे।  घर की रीढ़ की हड्डी थी देवनारायण शर्मा जी की पत्नी सरस्वती जिनके इर्द गिर्द इस परिवार की ग्रहस्ती चलती थी। दोनो बहुए सास का घर के काम मे बखूबी हाथ बटाती तथा नित रोज भांति भांति के व्यंजन पकते, पूरा परिवार एक साथ बैठकर उन व्यंजनों का आनंद लेता।  सुबह की सामुहिक पूजा से शुरू होने वाला दिन हँसी खुशी कैसे बीतता पता ही नही चलता।  पर वो कहते ...
अहसास को भी क्या बांध जा सकता है किसी गणित किसी व्यकरण मे  किसी कौमा, ब्रेकेटिंवर्टेड कौमा में।  अहसास तो एक समुदर है जहा है पानी रेत और नारियल पानी। 

गजल

जहाँ मौत के बाद के सपने बेचे जाते है वो किस्से यहाँ मजहब कहलाए जाते है। जीते जी दो घूट भी पीना हराम है जिन्हें उन्हें शराब के दरिया दिखलाए जाते है।  यहाँ तो हुस्न को छुपाते पर्दे की आड़ में वे नादाँ हूरो के हुस्न से बहलाए जाते है।  जो जीते है तमाम उम्र तपन में उमस में वे जहन्नुम की आग से दहलाए जाते है।  हैवन, स्वर्ग,जन्नत कहो या कहो बहिश्त मासूम दिल कुछ यूँही बरगलाए जाते है।  अगर संतुष्ट हो तो घर भी जन्नत ही है भटकने वाले तो यूँ भी भरमाये जाते है।  वो परम् तो मौजूद है तुम में और मुझ में और हम यूँही बेवजह घबराये जाते है। 

आशीर्वाद। लघुकथा।

पूरे घर मे बहुत चहल पहल थी,पंडित जी पूजन सामग्री को व्यवस्थित करने और पूजा की तैयारी में लगे हुए थे।  विभा और विवेक की प्रथम संतान के नामकरण संस्कार में शामिल सभी मेहमान भी लगभग आ ही चुके थे।  अरे!  बाबा कहा है दिखाई नही दे रहे।  वृद्धाश्रम गए होंगे उनके पुराने दोस्तों से मिलने,चिंता मत करो समय पर आ जाएंगे।  वो देखो,बाबा आ गए।  विधिवत पूजन प्रक्रिया सम्पन्न होने के बाद नवजात शिशु का नाम विभोर रखा गया।  विभोर!अहा,कितना प्यारा नाम है।  विभा ने चहकते हुए कहा।  चलो,सबसे पहले इसे बाबा का आशीर्वाद दिलवा दे।  विभा ने पल्लू सर पर रख विवेक सहित बाबा के चरण स्पर्श किये।  विभोर को बाबा की गोदी में देते हुए कहा।  बाबा इसे लंबी उम्र का आशीर्वाद दीजिये।  बाबा ने बच्चे के माथे को चूमते हुए उसके सर पर हाथ फेरा।  जब तक जिये स्वस्थ और प्रसन्न रहे।  अरे! बाबा अपने लंबी उम्र का आशीर्वाद क्यो नही दिया? क्योकि। "लंबी उम्र हर किसी के लिए अच्छी नहीं होती बेटा। "