Skip to main content

महाकुंभ।

पापा! काश आप भी चले होते प्रयागराज। 
एक तरफ श्वेत गंगा की सरिता और दूसरी ओर माँ कालिंदी। 
तभी छोटी बिटिया ने उत्साह से कहा,
और भीड़ इतनी की जिसका बयां करना कठिन है। 
अरे! छोड़ो भी बच्चों, ये आजतक शहर मे होने वाले रावण दहन और अन्य जुलूसों में भी नही जाते। 
पर क्यो पापा?
क्या अपको त्योहार अच्छे नहीं लगते। 

मैं क्या करूँ वहा जाकर। 
कुल्हे, कमर ऒर कंधे देखूं। 
क्योकि।
मै भीड़ का हिस्सा तो हो जाता हूँ पर भीड़ को भी नहीं देख पाता। 
"मैं ढिंगना जो हूँ"

Comments

Popular posts from this blog

आलेख

सोशल मीडिया और राष्ट्रीय संप्रभुता नेपाल में सोशल मीडिया बैन को लेकर जारी विरोध केवल एक देश का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने सूचना के आदान-प्रदान को सरल बनाया है, लेकिन आज यही माध्यम लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को अस्थिर करने का औजार भी बनता जा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने वाली बड़ी कंपनियाँ अपने मुनाफ़े के लिए तो हर देश में सक्रिय रहना चाहती हैं, किंतु उस देश के कानून और नियमों का पालन करने से कतराती हैं। यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए सीधा खतरा है। हाल के वर्षों में श्रीलंका, बांग्लादेश और अब नेपाल में देखा गया है कि किस प्रकार युवाओं के असंतोष को सोशल मीडिया पर उकसाकर बड़े आंदोलनों का रूप दिया गया। सत्ता परिवर्तन तक की कोशिशें इन माध्यमों से संभव हो रही हैं। इसमें केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ही नहीं, बल्कि विपक्षी दलों और अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हाथ रहता है। यह स्थिति बेहद खतरनाक है, क्योंकि अब यह स्पष्ट हो चुका है कि सोशल मीडिया कंपनियाँ किसी भी देश की आंतरिक स्थिरता को प्रभावित क...

नज्म

नज़्म: किसी के पास बैठो तो अदब से बैठो, ये पास होना सिर्फ़ जगह भरना नहीं होता, ये किसी के दिल में अपनी जगह बनाना होता है। नज़दीकियाँ अक्सर इंसान को हल्का कर देती हैं, लहज़ा बदल जाता है, अंदाज़ ढल जाता है— पर तुम अपनी तहज़ीब को थामे रखना। जब दूर हो जाओ और फासले बातों से ज़्यादा लंबे हो जाएँ, तब भी अपने शब्दों को गिरने मत देना, अपनी यादों को रूखा मत होने देना। क्योंकि अदब— सिर्फ़ पास होने की ज़रूरत नहीं, ये दूरियों में भी जिंदा रहना चाहता है। इसलिए— जब पास बैठो तो अदब से बैठो, और जब दूर हो जाओ तब भी बेअदब मत होना।
अब गरीबी का आलम ये हुआ प्लास्टर उखड़ने लगे हैं दीवारों से।