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गजल


ये बता, ख़ुद से ये मसख़री क्यों है,
तेरे अंदर ये कमतरी क्यों है।

था कभी एक आँगन अपना भी,
अब ये दीवार तेरी-मेरी क्यों है।

एक ही छत थी, एक ही चूल्हा,
घर में फिर आज बेदिली क्यों है।

कल तलक साथ थे सभी अपने,
आज रिश्तों में अनबनी क्यो है।

वक़्त बदला तो लोग भी बदले,
हर तरफ़ इतनी बेरुख़ी क्यों है।

दिल के दरवाज़े बंद हैं कब से,
फिर भी आँखों में नमी क्यों है।


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