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गजल


ये बता, ख़ुद से ये मसख़री क्यों है,
तेरे अंदर ये कमतरी क्यों है।

था कभी एक आँगन अपना भी,
अब ये दीवार तेरी-मेरी क्यों है।

एक ही छत थी, एक ही चूल्हा,
घर में फिर आज बेदिली क्यों है।

कल तलक साथ थे सभी अपने,
आज रिश्तों में अनबनी क्यो है।

वक़्त बदला तो लोग भी बदले,
हर तरफ़ इतनी बेरुख़ी क्यों है।

दिल के दरवाज़े बंद हैं कब से,
फिर भी आँखों में नमी क्यों है।


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नज्म

नज़्म: किसी के पास बैठो तो अदब से बैठो, ये पास होना सिर्फ़ जगह भरना नहीं होता, ये किसी के दिल में अपनी जगह बनाना होता है। नज़दीकियाँ अक्सर इंसान को हल्का कर देती हैं, लहज़ा बदल जाता है, अंदाज़ ढल जाता है— पर तुम अपनी तहज़ीब को थामे रखना। जब दूर हो जाओ और फासले बातों से ज़्यादा लंबे हो जाएँ, तब भी अपने शब्दों को गिरने मत देना, अपनी यादों को रूखा मत होने देना। क्योंकि अदब— सिर्फ़ पास होने की ज़रूरत नहीं, ये दूरियों में भी जिंदा रहना चाहता है। इसलिए— जब पास बैठो तो अदब से बैठो, और जब दूर हो जाओ तब भी बेअदब मत होना।
अब गरीबी का आलम ये हुआ प्लास्टर उखड़ने लगे हैं दीवारों से। 
उतारन ऐ चड़ावन जी कहानी आहे सीदी सादी जिंदगी बेस्वाद, बेमानी आहे।  कहिंखे घट कहिंखे वधिक मालिक़ डिनो आ मा शुकर भी करा हिय त बेईमानी आहे।