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पुस्तक समीक्षा

किसी भी पुस्तक को पढ़ने से पहले हर पाठक को ये बात ध्यान रखनी चाहिए कि वो उस पुस्तक को एक छात्र की तरह पढ़े। अपने मन मस्तिष्क पर किसी भी तरह की विचारधारा को दूर हटाकर एक छात्र की तरह अध्ययन करने पर ही हम किताब में परोसी गईं विषयवस्तु के साथ न्याय कर सकते है।ये ही बात लेखक पर भी लागू होती है कि जब वो किसी भी प्रकार का रचनाकर्म करे तो उसका मन मस्तिष्क कोरी सफेद दीवार जैसा हो जिस पर किसी भी विचारधारा की कील न ठुकी हो। परन्तु ये एक आदर्श स्थिति की बात है अनुममन कभी पाठक चूक जाता है,कभी लेखक अपने कर्तव्य का निर्वाह नही कर पाता।  कुछ ऐसा ही घटित हुआ है "शिवना प्रकाशन,सीहोर,मध्यप्रदेश" द्वारा प्रकाशित पुस्तक।  *जिन्हें जुर्म ए इश्क पे नाज़ था* के साथ।  पंकज सुबीर द्वारा लिखी गई ये पुस्तक खैरपुर नामक एक काल्पनिक कस्बे की कहानी है जिसमे प्राइवेट कोचिंग सेंटर चलाने वाले रामेश्वर को मुख्य पात्र के रूप में रखकर विभिन्न पात्रो औऱ घटनाओं को दिखाने का प्रयास किया गया है।  कमलेश्वर की "कितने पाकिस्तान" के बाद इस तरह के कई प्रयोग हुए है जिसमे वर्तमान और अतीत को मिलाकर एक कहानी कहने की क...
कुछ सामान हटाना होगा कुछ जगह बनानी होगी दर्द संभाले रखने के लिए दिल में जगह नही रही। 

लघुकथा

शीर्षक- अपना कंधा अपनी सलीब।  तालियों की गड़गड़ाहट के साथ मंच पर रखे डायस से अपनी खनकती आवाज में रश्मि प्रभा ने अपनी बात कहना शुरू किया।  अमूमन कम ही होता है कि किसी साहित्यिक कार्यक्रम में पूरा सभागार खचाखच भरा हुआ हो।  पर आज साहित्य संगम संस्था के रजत जयंती समारोह में साहित्य की हर विधा के लेखक और पाठक मौजूद है।  अभी आप सब की उपस्थिति में आदरणीय मंत्री महोदय द्वारा श्री अश्विनी शर्मा जी की पुस्तक का विमोचन किया गया।  हम चाहेंगे कि अश्विनी शर्मा जी अपनी पुस्तक के बारे में कुछ कहे।  तालियों की गड़गड़ाहट के बीच अश्विनी शर्मा डायस तक पहुचे।  साथियो आप सभी के स्नेह और सम्मान से अभिभूत हूँ तथा साहित्य संगम परिवार का बहुत बहुत शुक्रगुजार भी। मैं कोई प्रोफेशनल लेखक  नही हूँ। मैने जो अपने जीवन मे देखा,सीखा, अनुभव किया बस वो ही लिखने की कोशिश की है।अचानक हुए एक सड़क हादसे ने मुझसे मेरा सब कुछ छीन लिया। पढ़ना लिखना सब कुछ छूट गया,जीवन बेमानी सा हो गया था।  गहन अवसाद के उन क्षणों में मेरे पोते ने मेरे दोस्त का किरदार अदा किया और मुझे फिर कलम थामने पर मजबूर क...
वेक्सीन की पतंग उड़ेगी,कोरोना उड़ जाएगा आकाश का काला बादल जल्द ही छट जाएगा।  रोग मुक्त होकर सारे हम मिलकर गंगा नहाएंगे उत्सव में उल्लसित होकर तिल के लड्डू खाएंगे। 
बस यूँही निकालो कानो से इयरफोन नदी का संगीत सुनो जो पहुचा सके तुंम्हे सुकूँ तक ऐसी रहा चुनो समय ही पूंजी हैं मत व्यर्थ गवाओ इसे समय मिले तो घर के बुजुर्गों की बात सुनो दुनिया क्या कहती हैं क्या नही ये मत सुनो कुछ पल मौन बैठो अपने दिल की बात सुनो बड़े मशहूर हो फेसबुक और ट्विटर पर यारो कभी पापा के पास बैठो उनके जज्बात सुनो चलो छोडो मत मनो मेरी न मेरी बात सुनो आहट को पहचानो आने वाले कल की बात सुनो                                 डॉ दिलीप बच्चानी                                 पाली राजस्थान

गजल

इशारो से आँख से अदा से बात करती है मोहब्बत कब भला ज़ुबाँ से बात करती है।  पहली किरण गिरती है जब उसके पानी पर देखना बहती नदी तब खुदा से बात करती है।  गुल भृमर के मन को जाने भीच ले खुदको कुदरत भी देखो किस हया से बात करती है।  बेसबब भटकती नही वो सारे गुलशन में हर कली हर फूल औ लता से बात करती है।  सुबह कोई रंग भरता शाम कैसे स्याह होती पंखुड़ी पर बैठ शबनम फ़िजा से बात करती है। 

संवेदना विसर्जन (लघुकथा)

शीर्षक- *संवेदना विसर्जन*  पीतल के नए चमचमाते कलश में राख में लिपटी जली हुई हड्डियां जिनके ऊपर कुछ फूलों की पंखुड़िया रखी थी और लाल कपड़े से कलश का मुंह बंद कर दिया गया था।  ट्रेन के हिचकोलों के बीच एक हड्डी दूसरी से पूछ बैठी,"बहन! तुम किस अंग का हिस्सा हो?" "मैं दाएं हाथ की मेटाकार्पल हूँ जब तक चलने फिरने की अवस्था थी तब तक मेरी द्वारा पकड़ी हुई छड़ी के सहारे ही वो चलते थे।  औऱ तुम?"    " मैं घुटने का *पटेला* हूँ सबसे पहले शरीर में पीड़ा *घुटनों* से ही शुरू हुई थी।" तभी एक तिकोनी सी हड्डी पर नजर पड़ी,कोई कुछ पूछता उससे पहले ही वो बोल पड़ी- "मै कमर की लम्बर वर्टिब्रा हूँ *।* मेरे ही आस पास कमर में घाव पड़ गया था, फिर मवाद, फिर कीड़े औऱ उसी पीड़ा ने आखिर में जान ले ली।  वो जो पट्टी करने डॉक्टर आता था, उसने कितना कहा कि वॉटर बेड या एयर बेड की व्यवस्था कर लीजिए घाव नही पड़ेंगे। पर सुनता कौन।" तभी दिमाग की फ्रोन्टल बोन ने कहा- "अब ये हमे ले जा रहे है हरिद्वार, जहाँ होगा पूजा पाठ, नदी में अस्थि विसर्जन, फिर वापस आकर ब्राह्मण भोज,हवन,दान,गंगा प्रसादी लाखो का...