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अजब आलम है साहेब किताबे कौन पढ़ता है मोबाईल के शगल के दौर में खलल का नाम किताब है।

कवि सम्मेलन।

जोरो शोरो से प्रचार किया गया,अखबार, होर्डिंग, सोशल मीडिया पोस्ट के द्वारा विशाल कवि सम्मेलन का।  तय समय से करीब दो घंटे बाद कार्यक्रम शुरू हुआ, संचालक ने ओजपूर्ण वाणी में देशभक्ति से लेकर सहित्यप्रेम तक की बाते की।  फिर आमंत्रित अतिथियों के वृहद परिचय दिए गए, और इस प्रकार दिए गए मानो सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्न यदि पर उपस्थित है।  सरस्वती वंदना की औपचारिकता के बाद कवि सम्मेलन शुरू हुआ।  संचालक महोदय ओजपूर्ण वाणी में बोले हम अति विनम्रतापूर्वक रूप से मंच पर बुलाना चाहते हैं श्रीमान ए को जिनका साफा पहनाकर स्वागत करेंगे श्रीमान क, मोमेंटो देंगे श्रीमान ख  और दुप्पटा पहनाएंगे श्रीमान ग।  अब इसी क्रम में आप सब आते रहिए और सम्मानित होते रहिए।  अब अंत मे हमारे लाडले कवि ज्ञ का स्वागत है।  ज्ञ मंच की तरफ जा रहा था तभी अनुभवी आयोजनकर्ता ने कलाई थाम ली। संछेप में पढ़ना कार्यक्रम वैसे ही लेट हो गया है।  कविता क्या है कविता का बैठा हुआ है भट्टा, मुख्य बात है साफा, मोमेंटो और दुपट्टा। 

दलबदल सही या गलत ?

भारतीय राजनीति में हम अक्सर देखते है कि एक पार्टी के सदस्य दूसरी पार्टी में चले जाते है। चुनाव के समय ऐसी घटनाओं की संख्या बढ़ जाती है,परंतु कमोबेश ये एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।  दलबदल के इतिहास की बात करे तो सबसे पुरानी घटना कुरुक्षेत्र में महाभारत के युद्ध के प्रारंभ के समय हुई थी, जब ज्येष्ठ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ने आव्हान किया कि दोनों पक्षों में से कोई भी योद्धा पाला बदलना चाहता है तो बदल सकता है तब कौरव पक्ष के युयुत्सु ने पाला बदला था और धर्मराज युधिष्ठिर के पक्ष में युद्ध लड़ने का निर्णय लिया।  दलबदल के कारणों की बात करे तो सबसे बड़ा एक ही कारण नजर आएगा और वो है सत्ता सुख का स्वार्थ।  नगर परिषद के पार्षदों से लेकर विधानसभा सदस्यों,लोकसभा सदस्यों तक ये सभी केवल और केवल सत्ता सुख के लोभ में पाला बदलते है। बड़े से बड़े सिद्धांत,निष्ठाएँ रातो रात धूलधूसरित हो जाती है।  कभी टिकट कटने के कारण, कभी टिकट कटने की संभवना के कारण,कभी पार्टी द्वारा उपेक्षा के कारण ये नेतगण सुविधा अनुसार अपनी निष्ठाएँ बदलते रहते है। दलबदल का एक कारण अधिकांश राजनीतिक दलों में व्याप्त परि...

दो शेर

गुमसुम रहो उदास रहो लोग खुश हारे रहो परास्त रहो लोग खुश। वो तुम्हें अपने जैसा देखना चाहते उनकी तरह विषाक्त रहो लोग खुश। 

कल होगा? (कविता)

अमूमन हम सभी अपने आज को जबरदस्ती कल में घसीटकर ले जाने पर तुले है। आज नही हुआ तो क्या कल कर लेंगे! इसे आज पर खर्च न करके,कल के लिए सहेज लेते है।  लगभग सभी का दिवास्वप्न, कल आज से बेहतर होगा। आज को किसी न किसी तरह गुजार रहे है कल के लिए। कितना भरोसा है हमे की कल होगा?

केंद्रीय चुनाव परसेप्ट का चुनाव है।

ये साल देश के लिए नई सरकार चुनने का साल है।साल शुरू होते ही चुनावी गतिविधियों में भी तेजी देखी जा सकती है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में चुनाव विभिन्न स्तरों पर लड़े जाते है जैसे कि लोकसभा, विधानसभा,नगर निगम,पंचायत आदि,सत्ता के विकेंद्रीकरण का ये एक बेहतरीन उदाहरण भी है।  अब चूंकि लोकसभा का चुनाव निकट है तो स्वाभाविक है कि चर्चा का केंद्र बिंदु केंद्रीय चुनाव ही रहने वाला है।  एक लोकसभा सदस्य का कार्यक्षेत्र बहुत बड़ा और बहुत फैला हुआ होता है,इसलिए चुनाव प्रचार के दौरान या उसके बाद के पांच वर्षों में भी सभी क्षेत्रों और मतदाताओं तक पहुँचना अत्यंत दुष्कर कार्य है।  तो फिर हार और जीत आखिर तय कैसे होती है ये सब तय होता है परसेप्शन के आधार पर।  परसेप्शन उम्मीदवार के पक्ष और विपक्ष में हो सकता है और परसेप्शन सरकार के पक्ष और विपक्ष में भी हो सकता है।  सरकार अपने कार्यकाल के दौरान जो फैसले लेती है उस आधार पर मतदाता अपने दिलोदिमाग में एक धारणा बना लेता है और फिर उसी आधार पर वोट पड़ते है और हार जीत का निर्णय हो जाता है। इसलिए हम देखते है कि हमारी अपनी लोकसभा या हमारे आसपास...