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रसमुग्धा(लघुकथा)

पारिवारिक आयोजन में सम्मिलित होने के लिए तीनो बेटे चिड़ावा आये हुए थे।दोपहर के भोजन उपरांत सभी लोग इकट्ठा बैठे हुए गपशप में मशगूल थे,तभी सबसे छोटे बेटे ने अपने पिता रिटायर्ड प्रिंसिपल ओमप्रकाश शर्मा जी से पूछा बाबूजी आपकी पत्रिका रसमुग्धा का क्या हाल है कितनी प्रतियां छप रही है आजकल। 
अब क्या बताये? आजकल की पीढ़ी को मोबाइल और कम्प्यूटर से फुर्सत मिले तो कोई पुस्तक,पत्रिका पढ़े। 
पिछले तीन महीने से प्रकाशन लगभग बंद ही पड़ा हुआ है, अब न तो विज्ञापन मिलते है और न ही पाठक। 
बाबूजी आप एक काम क्यो नही करते एक वेब पोर्टल बनाकर रसमुग्धा को ई-पत्रिका के रूप में प्रकाशित करिए,पाठकों तक पहुंच भी बढ़ेगी खर्चा भी कम होगा और हमारी रसमुग्धा पुनर्जीवित भी हो जाएगी। 
मैं आपको मेरा लैपटॉप दे जाऊंगा,आप लेखकों की रचनाएं, लेख,कविता,कहानियां ओर अपना संपादकीय लिखकर मुझे भेज दीजिएगा और हर महीने मासिक ई-पत्रिका रसमुग्धा प्रकाशित हो जाएगी। 
ओमप्रकाश शर्मा जी ने आज के दौर की परिस्थितियों को स्वीकारते हुए हामी भर दी। 

बेटे खुश थे कि इसी बहाने पिता की पेंशन के रुपये पत्रिका में फालतू खर्च नही होंगे,और वृद्ध संपादक महोदय अपनी रसमुग्धा के पुनर्जीवित होने से। 

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